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Woh bachhpan

Monday, March 14, 2016

कोई लौटा दे वोह बचपन के दिन
जब अपनी ही दुनिया के हम शहजादे थे
अपनी माँ की आँखो के दुलारे थे

जब स्कूल जाना दुनिया का सबसे मुश्किल काम था
भाई से लड़ना फ़िर मनाना एक बहुत ज़रूरी काम था
रेत के ढेर में किले बनाना ही तो एक काम था
बस कोई लौटा दे वोह बचपन की यादें

मा के आँचल में छुपकर दुनिया की
कोई भी मुसीबत हम यूही ही झेल जाते थे
आज उसी मा से मिलने को समय निकलना पड़ता है
जिसके लिए एक समय पूरी दुनिया हमी थे
बस कोई लौटा दे बचपन की वोह यादें

पिता की उँगली पकड़कर चलना हमने सीखा
आज बस जिंदगी में अकेले दौड़ ही रहे है
ऐसा लगता है जिंदगी तो बस नाम के लिए जी रहे है
बस कोई लौटा दे बचपन की वोह यादें

आज भी आँखो में चमक आ जाती है
होथो पे मुस्कान दुश्मनों को याद करके भी आ जाती है
ना पैसे थे ना पैसे कमाने की वोह दौड़ थी
बस दिन में जागते हुए सपने देखते थे

कभी शक्तिमान तो कभी केप्टन व्योम बनते थे
अपने लड़कपन में तो हम भगवान से भी लड़ते थे
फर अपनी मा से लिपटकर हम सोते थे
कभी कभी बचपन में हम फ़िर खो जाते है

काश कोई सपना ये पूरा कर देता
बस कोई लौटा दे बचपन की वोह यादें

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